जिन्दगी जिंदादिली का नाम है......
यूँ तो पिताजी का पूरा जीवन चरित यदि शब्दों पर उकेरने लगूँ तो निश्चित तौर पर न तो इससे अलग कुछ रचने का समय मिलेगन और ना ही आवश्यकता रहेगी...वैसे भी एक फौजी जीवन में शायद देश के हर सिपाही के पास ..कहने लिखने को एक अलग ही इतिहास होता है..खैर जब इस मंच पर हूँ तो कोशिश तो रहेगी ही..आज पिताजी की उन बातों..उन आदतों का जिक्र ..जो उन्हें बचपन से देखते समझते सीधे सीधे मुझ में आ गयी. इस बात की मुझे जितनी खुशी है उतना ही उन्हें ..जो मुझे जानते हैं..आज उनमें से कुछ को याद कर रहा हूँ......
शराब के प्रति उनके बेरुखी : - जो फौजी जीवन के आसपास रहे हैं..वे शायद इस बात को भली भांती जानते होंगे की फौज में शराब सेवन लगभग एक साम्नाया सी आदत है ..हालांकि इसके बहुत से वाजिब-गैरवाजिब कारण और तर्क..शराब का सेवन करने वालों के पास होता है..जैसे .उनकी काम करने के अनिश्चित घंटे..या जिन परिस्थितियों में वे रहते हैं...या फिर लद्दाख और सिक्किम के पहाडों की हड्डियों को गला देने वाली ठण्ड में रम,. सकोच..ब्रांडी... के रूप में शरीर को गर्म रखने के आवश्यक पदार्थ की तरह..
सबके पास अपनी अपनी दलीलें हैं..मगर पिताजी को कभी भी इन दलीलों की जरूरत नहीं पडी ...तब भी नहीं जब वे इक्काह्त्तर की लड़ाई में ...दुश्मन की बमबारी में ..सिक्किम की पहाडियों में हजारों फुट ....अपने साथियों के साथ ..गिरे थे...और फिर न जाने किन शक्तियों के बल पर बच निकले थे.....पिताजी को मैंने कभी भी शराब का जिक्र तक करते हुए नहीं सुना...उनके दोस्तों में भी शायद ही कोई ऐसा हो जो कभी पी कर हमारे घर पहुंचा हो...और यही कारण रहा की आज अपने जीवन की आधी यात्रा के बाद भी ..मैं खुद को किसी भी तरह के नशे के सेवन से मुक्त पाटा हूँ....मुझे इस बात की खुशी है की ...मुझ जैसे बहुत कम बचे लोगों की कतार में यदि मैं हूँ.....तो इसकी वजह आज पिताजी हैं....उम्मीद और विश्वास है की मेरा पुत्र भी मुझे में यही सब देख पायेगा...
जूझने का जज्बा :- जैसा की कह चुका हूँ की पिताजी ..बांग्लादेश की लडाई में ..अपने साथियों के साथ एक एम्ब्युलेंस समेत ..दुश्मन की बमबारी का शिकार हो कर ..गहरी घाटी में गिर पड़े थे....कुल सात लोगों में से उनके अलावा और भी एक खुशकिस्मत था जो बच सका था...फौजी क्वार्टरों में रहते हुए डेढ़ महीने तक ..माँ को इस बात की कोई खबर नहीं दी गयी थी...जब वापस हमारे पास पहुंचे..शरीर सफ़ेद...डाक्टरों ने कहा...खून न के बराबर है...माँ तो जैसे दर कर टूट ही गयी थी...पिताजी जानते थे.....उन्होंने माँ से कहा ..कल से सिर्फ पालक उबाल कर .....और छ महीनों में जाकर शरीर जुड़ पाया था .....उन दिनों में अक्सर उनके मुंह पर एक ही बात होती थी ..जिन्दगी जिंदादिली का नाम है........मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं....
अलगी किस्त में बात करूंगा ..उनके हिम्मत...और ..दूसरों के लिए काम आने की आदत के बारे में ......



10 टिप्पणियाँ:
Behtarin rachna...mere pita jee fauji nahi the lekin laga ki bo bhi esi jajbe hain kahin...
पिता के व्यक्तित्व का असर निश्चित ही पुत्र पर पड़ता है. आपके पिता जी के जज्बे को सलाम.आगे इन्तजार करते हैं.
बहुत सुन्दर जी रचना मन को प्रबल बनाने वाली है!! आगे जरुर लिखिए !!
Ajayji,
Padhke bada sukun mila...ke aapke paas apne pitaji ke yaadon ke aise khazane hain!
Intezaar rahga aage padhneka...!
Unki smrutiyon ko naman!
भावपूर्ण संस्मरण के लिए आभार.
agli kist ka intzaar rahega. Maa K saath Blog Per Pita per Bhi likha jaa rha hai. Badhayi
बडा फ़ख्र हुआ आपके पिताजी के बारे जानकर....!!
zindgee zindadili ka naam hai....boht achhi post...
nice
बहुत सुन्दर रचना !
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