<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' version='2.0'><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200</atom:id><lastBuildDate>Thu, 07 Jan 2010 17:31:36 +0000</lastBuildDate><title>पिताजी</title><description>शुरूआत से संपन्‍न होने तक का सफर</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/</link><managingEditor>avinashvachaspati@gmail.com (अविनाश वाचस्पति)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>71</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-7461100746856181074</guid><pubDate>Wed, 06 Jan 2010 15:57:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-07T20:54:08.909+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>गरिमा</category><title>मै क्या करूँ मेरे तो एक ही मम्मी पापा हैं ना</title><description>कल मेरी बहन से बात कर रही थी तो उसने प्रसंग मे कुछ ऐसा कहा जो लगा कि वाकई मे सबके सामने यह बात बोली जानी चाहिये। यह बात सिर्फ मेरे पापा जी के लिये नहीं बल्कि उन सबके लिये है जिनके एक से ज्यादा बच्चे हैं।&lt;br /&gt;वैसे तो हम सब जानते हैं कि मम्मी पापा का प्यार अपने बच्चो के लिये बराबर होता है। वो अपने बच्चो के लिये हमेशा ही सही निर्णय लेते हैं। उनकी सारी सुख सुविधाओं का ख्याल रखते हैं। यह हमेशा कहा जाता है कि बच्चे क्या जाने कि मम्मी पापा का प्यार कैसा होता है। वो तो बस इसी होड़ मे होते हैं कि मुझे ज्यादा मिले, मुझे जो प्यार मिले वो बाकियों की तुलना मे सबसे ज्यादा हो। पर क्या उनका ऐसा चाहना गलत है? जाने क्यों बच्चो के इस आदत के लिये हर वक्त कहा सुनी होती है। मेरे ऑफिस मे आने वाले हरेक मम्मी पापा यह शिकायत करते हैं। पर क्या इस बात को थोड़े और करीब से जानने की कोशिश करते हैं। &lt;br /&gt;ममा पापा के तो माना कि २-३ बच्चे हैं, पर बच्चो के तो एक ही ममा पापा हैं न। ममा पापा की इच्छायें, चाहतें, जिम्मेदारियाँ सबके लिए भले ही बराबर मात्रा मे बँट जाता हो, लेकिन बच्चा क्या करे? उसकी तो सारी चाहत, सारी तमन्ना जो अपने ममा पापा से उसे बाँटने के लिये है वो तो इकलौते हैं। ऐसी स्थिती मे एक बच्चा अपने आपको कैसे सम्भाले?&lt;br /&gt;किस तरह वो खुद को यकिन दिलाये कि मेरे आसमां मे मै अपने पंख स्वतंत्रता से फैला सकता हूँ।&lt;br /&gt;गड़बड़ तो बचपन मे ही हो जाती है। जब बच्चा अपने आसमां मे पनपने कि कोशिश करता है तभी कोई और आ जाता है और उसके आसमां को अपना बना लेता है। उस समय उसकी मनोस्थिती को समझते हुए भी सबका ध्यान नवागन्तुक की तरफ ज्यादा रहता है, और यही से एक अलग सी कसमसाहट जीवन भर के लिये उसके आसमां मे भर जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और बच्चे का मन हमेशा यह कहता रहता है कि "मै क्या करूँ मेरे तो एक ही मम्मी पापा हैं ना"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा सभी से अनुरोध है की प्लीज इस आवाज को अनसुना मत करिये कहीं बहुत ज्यादा देर ना हो जाये&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-7461100746856181074?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2010/01/blog-post_06.html</link><author>noreply@blogger.com (गरिमा)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-875313414793228763</guid><pubDate>Tue, 05 Jan 2010 13:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-05T18:51:52.481+05:30</atom:updated><title>मेरी झूठी जिंदगी की सच्चाई...</title><description>Respected papa,&lt;br&gt;&lt;div class="gmail_quote"&gt;&lt;br&gt;मेल लिखते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा पर मेरे लिए जरूरी था... आपको भी मालूम है मैं अपनी कोई भी बात आज तक सीधे तरीके से नहीं कह पाया बस यही तरीका समझ में आया... आप कह सकते है कि मुझ में हिम्मत नहीं है आपको face करने की.&lt;br&gt;  &lt;br&gt;कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ ख़तम समझ नहीं आ रहा. बस लिखे जा रहा हूँ. मैं जानता हूँ मैंने आपको बहुत ज्यादा तकलीफ दी है, बचपन से लेकर आज तक... कभी आपको समझने का प्रयास ही नहीं किया.. क्योंकि मैं तो हमेशा अपनी ही दुनिया और महत्व्कान्छाओं में खोया रहा. हमेशा मैंने आपको और माँ को गलत समझा... जिसका नतीजा ये है कि आज मैं ही अपने लिए गलत हो गया. मैंने अपनी कमजोरियों और नाकामियों को झूट के सहारे ढकने की कोशिश की और उसके लिए आप लोगों को जिम्मेदार माना. पर सच कहता हूँ पापा आज मैं अपनी सारी गलती दिल से मानता हूँ और बदलना चाहता हूँ. पहले क्या हो गया उस पर सोंचने का अब कोई फायदा नहीं. आगे क्या करना है ये फैसला लेने का वक़्त है. मुझे आपलोगों के साथ की जरूरत है. मानसिक रूप से. मैं अपनी जिंदगी सुधारना चाहता हूँ, बदलना चाहता हूँ. और आपसे बढ़कर मेरे लिए कोई और हो ही नहीं सकता. बहुत सी बातें है जो मैं आज भी नहीं कह सकता आपसे, पर कुछ बातें बताना मेरे लिए जरूरी है.&lt;br&gt;  &lt;br&gt;आपको याद होगा डॉक्टर ने भी यही कहा था कि मुझे किसी के साथ अपने emotion share करने की जरूरत है. आप तैयार थे पर उसने कहा मुझे तैयार होना होगा. आज मैं तैयार हूँ. पापा घर की स्थितियों ने मुझे हमेशा घर से मानसिक रूप से अलग किया. घर के झगडे, पैसों को लेकर तनाव और... मैं खुद तनाव में आ गया... रही सही कसर उस दिन ने पूरी कर दी. मैं अपने घर आने से डरने लगा. नींद नहीं आती थी. ८वि क्लास में था कुछ और समझ में नहीं आया और सिगरेट पीना शुरू कर दिया. मन को संतुस्टी मिलने लगी और मैं आदत में पड़ता गया. धीरे धीरे शराब भी पीने लगा. आज भी सिगरेट पीता हूँ, हाँ शराब मैंने छोड़ दी है. वादा करता हूँ धीरे धीरे सिगरेट भी छोड़ दूंगा. नफरत बढती ही गयी मेरी घर से. और मैं गलत सोंच में चलता गया. मुझे किसी का attention भी नहीं मिलता था. पेंटिंग करने की इक्छा थी पर छोड़ दी. गुस्से में. क्योंकि आपने मुझे १५० रुपये नहीं दिए थे पेंटिंग क्लास में addmssion के लिए जबकि दीदी और पीयूष का दाखिला कराटे में करवाया गया था. मेरे नाराजगी और बढ़ी. मुझे लगा किसी को मेरी परवाह नहीं है. खुद की याद दिलाने के लिए पैसे चुराने शुरू किया, स्कूल से भागना शुरू किया. ताकि आप लोगों का ध्यान मुझपर केन्द्रित हो. ध्यान केन्द्रित तो हुआ पर मुझे आप लोगों ने और दूर भेज दिया. नानी के यहाँ जाना नहीं चाहता था. पहले भी गुस्सा आता था जब मुझे चाचा के साथ सोना पड़ता था और दीदी और पीयूष आप लोगों के साथ सोता था. घर के कामों में मुझे हाथ बंटाना पड़ता था. ये सारी बातें मुझपर गलत रूप से हावी होती गयी. जान बुझ कर पढाई से भागने लगा. स्कूल न जाना (बेगुसराई में भी) कोलेज न जाना.... फिर पटना आ गया... मैंने सोंचा अब घर से दूर हूँ तो सब ठीक हो जायेगा. पर दिमाग तब तक मुझपर पूरा हावी हो चूका था वहां भी मैं गलत रास्तों पर चलता रहा. पैसे कमाने की भूख पैदा हो गयी... कमाया भी मैंने पर गलत चीजों में खर्च करता रहा. दोस्त कभी बहुत ज्यादा नहीं रहे. मैं introvert था, ज्यादा किसी से बात नहीं कर पाता था. शायद डरता था. बस अपने अकेलेपन को ख़त्म करने के लिए मैंने अपने आस पास अपनी ही एक दुनिया बना ली. एक काल्पनिक दुनिया. जिसके लोग मेरे इशारों पर नाचते थे. मुझे सुनते थे मुझे अपना भगवान मानते थे. इन सब चीजों में धीरे धीरे बढ़ता ही गया और मेरी समस्या इतनी बड़ी होती गयी. सही मानिए मुझे खुद भी नहीं पता चला. अकेले फ़ोन पर बातें करता था बिलकुल वैसे ही जैसे सच में किसी से बात कर रहा होऊं. अपनी काल्पनिक दुनिया को मैंने इतना बड़ा कर लिया कि उससे मेरी ही जिंदगी affected होने लगी. जानता था की जो कर रहा हूँ वो गलत है फिर भी करता गया. क्योंकि लोगों का ध्यान केन्द्रित करने में मैं सफल रहा था. लोग अब मुझे सुनने लगे थे. इसलिए भी चाह कर भी मैं इन सबसे कभी बाहर नहीं आ पाया.&lt;br&gt;  &lt;br&gt;पटना के ही क्रम में पापा मुझे एक लड़की पसंद आ गयी. मैं पागल हो गया उसके लिए. पटना में मैं बहुत से गलत रास्तों पर था. पर उन सबसे बाहर आने में मेरे काल्पनिक दोस्तों और उस लड़की का बहुत बड़ा हाथ है. मेरे काल्पनिक दोस्तों ने मुझे समझाना शुरू किया कि अगर तुम उस लड़की को चाहते हो तो ये सब काम छोड़ दो. उन्होंने समझाया कि एक गलत लड़के को वो कैसे प्यार करेगी... बस मैंने वो सारे काम छोड़ दिए और नौकरी की तलास में लग गया. मेरा देहरादून जाना उसी का नतीजा था. वो लड़की देहरादून में ही पढ़ती थी और तब तक हमारी दोस्ती हो चुकी थी. देहरादून पहुँच कर जब मैंने अपनी पहल नौकरी २००० की ज्वाइन की तब मैंने कंचन को प्रोपोज कर दिया पर उसने साफ़ मना कर दिया. उसने कहा वो मुझे सिर्फ अपना दोस्त मानती है और अब वो भी ख़त्म. तत्काल मैंने देहरादून छोड़ने का फैसला कर लिया और पुणे चला गया. नफरत खुद से और बढ़ गयी. दिमाग इतने तनाव में था कि वहां भी ठीक से काम नहीं कर पाया और फिर वापस पटना और फिर दिल्ली. मेरे काल्पनिक दोस्तों ने ही मुझे संभाले रखा. मुझे अच्छा करते रहने के लिए मजबूर करते रहे. उसी कारण मैंने नौकरी भी की. मेरी नौकरी अच्छी चल रही थी और मुझे उस में दिल भी लग गया था. पर मेरी पेरसोनल जिंदगी वैसी की वैसी बनी रही. मेरे काल्पनिक दोस्त हमेशा दबाव डालते कि कंचन से फिर मिलो, और दो साल के बाद लास्ट इयर मार्च में मेरी उससे फिर बात चित भी शुरू हो गयी. उसने सबकुछ भुला कर मुझे दुबारा अपना दोस्त स्वीकार किया. पर मैं तो उसे पाना चाहता था. बेवकूफियां करता रहा. हमेशा उसे समझाने की कोशिश करता रहा. अपने काल्पनिक दोस्तों के द्वारा भी उसे समझवाता. पर उसका असर उल्टा होता गया और ६ महीने के बाद ही उसने मुझसे दोबारा दोस्ती तोड़ दी और फिर कभी बात न करने का ठान लिया. मैंने उसकी बात को शालीनता से मान लिया. पर मेरा दूसरा पागल दमाग अब तक उसके पीछे पड़ा रहा. और उसके बारे में खोज खबर लेता रहा. सच तो ये है की सितम्बर २००८ के बाद मेरी उससे एक बार भी बात नहीं हुई है फिर भी मुझे उसके बारे में सब मालूम है. वो कहाँ है, क्या करती है. सब कुछ... पापा आपको एक बार एक कौरिएर भी मिला था, वो भी मेरे काल्पनिक मित्रों द्वारा ही लिखा गया था....&lt;br&gt;  &lt;br&gt;पर पापा मैं इन सब चीजों से निजात भी पाना चाहता था... मैं अपने दुसरे दिमाग को हराना भी चाहता था पर हमेशा कमजोर पड़ गया. वो मुझपर हमेशा हावी रहा. और शायद अभी भी है. पापा मैं ठीक होना चाहता था... मैं चाहता था की मैं एक नोर्मल जिंदगी जिउं... पर सफल नहीं हो पा रहा था. पापा आपने मेरा मेल राजीव से हैक करवाया... मैं जानता था कि आप ऐसा कदम उठाएंगे... और इस लिए मैंने जान बुझ कर मेल को आसानी से हैक करने दिया. वरना मेरा मेल बिना मेरे मर्जी से कोई नहीं हैक कर सकता... मैं चाहता था लोगों को मेरे बारे में, मेरी कमजोरियों के बारे में पता चले. मैं ठीक होना चाहता हूँ...&lt;br&gt;  &lt;br&gt;पापा मुझे पता है आप मुझे अपना उत्तराधिकारी मानते है पर मैं आज किसी लायक नहीं हूँ. मैंने आपकी आँखों से कई बार आंशु गिरवाये है... पर सच मानिये मेरी जिंदगी का कोई एक दिन भी ऐसा नहीं रहा जब मैं नहीं रोया होऊं. जानते हुए की मैं झूठ बोल रहा हूँ, झूठी जिंदगी में जी रहा हूँ मैं ये करता गया. रोकने की कोशिश की पर कभी हुआ नहीं... पर अब मैं ऐसा नहीं चाहता... जानता हूँ मैं माफ़ी के लायक नहीं हूँ... इस लिए मैं माफ़ी मांगता भी नहीं आपसे और मांगूंगा भी नहीं... पापा मेरी जिंदगी में जो हो गया वो हो गया. बस अब मुझे इन सबसे बाहर आना है. और मैं अपने तरीके से इसे जीना चाहता हूँ पर आप लोगों के सहयोग से....&lt;br&gt;  &lt;br&gt;पापा ये बातें बताना मेरे लिए जरूरी था... मैं अब आपसे और झूठ नहीं कहना चाहता... मैं जान गया हूँ कि मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ और ठीक होने के लिए मुझे आपके सहारे की जरूरत है... आप साथ देंगे न???&lt;br&gt;&lt;br&gt;अभिषेक&lt;br&gt; &lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden"&gt;&lt;input onclick="jsCall();" id="jsProxy" type="hidden"&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-875313414793228763?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2010/01/blog-post_05.html</link><author>ab8oct@gmail.com (अभिषेक प्रसाद 'अवि')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-7715159012398124566</guid><pubDate>Fri, 01 Jan 2010 15:25:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-01T20:55:15.512+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>acharya sanjiv 'salil'</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>samyik hindi kavita</category><title>शुभ कामनाएं सभी को...   संजीव "सलिल"</title><description>शुभ कामनाएं सभी को...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव "सलिल"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;salil.sanjiv@gmail.com&lt;br /&gt;divyanarmada.blogspot.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की.&lt;br /&gt;शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें.&lt;br /&gt;शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण करें..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ 'शिव' बना, हमको गरल के पान की सामर्थ्य दे.&lt;br /&gt;शुभ सृजन कर, कंकर से शंकर, भारती को अर्ध्य दें..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ वही 'सुन्दर' जो जनगण को मृदुल मुस्कान दे.&lt;br /&gt;शुभ वही स्वर, कंठ हर अवरुद्ध को जो ज्ञान दे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ तंत्र 'जन' का तभी जब हर आँख को अपना मिले.&lt;br /&gt;शुभ तंत्र 'गण' का तभी जब साकार हर सपना मिले..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ तंत्र वह जिसमें, 'प्रजा' राजा बने, चाकर नहीं.&lt;br /&gt;शुभ तंत्र रच दे 'लोक' नव, मिलकर- मदद पाकर नहीं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ चेतना की वंदना, दायित्व को पहचान लें.&lt;br /&gt;शुभ जागृति की प्रार्थना, कर्त्तव्य को सम्मान दें..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ अर्चना अधिकार की, होकर विनत दे प्यार लें.&lt;br /&gt;शुभ भावना बलिदान की, दुश्मन को फिर ललकार दें..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ वर्ष नव आओ! मिली निर्माण की आशा नयी.&lt;br /&gt;शुभ काल की जयकार हो, पुष्पा सके भाषा नयी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ किरण की सुषमा, बने 'मावस भी पूनम अब 'सलिल'.&lt;br /&gt;शुभ वरण राजिव-चरण धर, क्षिप्रा बने जनमत विमल..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ मंजुला आभा उषा, विधि भारती की आरती.&lt;br /&gt;शुभ कीर्ति मोहिनी दीप्तिमय, संध्या-निशा उतारती..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ नर्मदा है नेह की, अवगाह देह विदेह हो.&lt;br /&gt;शुभ वर्मदा कर गेह की,  किंचित नहीं संदेह हो..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ 'सत-चित-आनंद' है, शुभ नाद लय स्वर छंद  है.&lt;br /&gt;शुभ साम-ऋग-यजु-अथर्वद, वैराग-राग अमंद है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ करें अंकित काल के इस पृष्ट पर, मिलकर सभी.&lt;br /&gt;शुभ रहे वन्दित कल न कल, पर आज इस पल औ' अभी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ मन्त्र का गायन- अजर अक्षर अमर कविता करे.&lt;br /&gt;शुभ यंत्र यह स्वाधीनता का, 'सलिल' जन-मंगल वरे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*******************&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-7715159012398124566?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2010/01/blog-post_01.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-8887642455109021245</guid><pubDate>Fri, 01 Jan 2010 07:31:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-01T13:23:14.130+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>अविनाश वाचस्‍पति</category><title>पिता हैं साथ तो पुत्र तन्‍हा नहीं होता (अविनाश वाचस्‍पति)</title><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/Sz2ppfoi24I/AAAAAAAACF4/H6EUAPO-BmE/s1600-h/%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 60px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/Sz2ppfoi24I/AAAAAAAACF4/H6EUAPO-BmE/s320/%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5421676056755231618" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जिसको कभी लालच नहीं होता&lt;br /&gt;होता है, पर अपने लिए नहीं&lt;br /&gt;चाहता है मन सब करे अर्पण&lt;br /&gt;समर्पण सब यहीं पर है होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता पर्याय है सदा देने का&lt;br /&gt;पुत्र तैनात सदा सब पाने को&lt;br /&gt;देकर भी सब कुछ यहां पर&lt;br /&gt;पिता बीज सदा सुख के बोता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देता है सब कुछ खुशी खुशी&lt;br /&gt;चाहे संतान रहे सदा सुखी&lt;br /&gt;पिताजी का पर्याय जहां में&lt;br /&gt;मिल जाए, पर नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुत्र बनता है जब खुद पिता&lt;br /&gt;बोध उसे देने का नहीं होता&lt;br /&gt;लालच मन में जरा नहीं होता&lt;br /&gt;मन में बहता प्रेम का सोता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो हजार दस का दम, नौ का गम&lt;br /&gt;पिता रहे साथ तो जरा नहीं होता&lt;br /&gt;हर पल होता है, नया बना रहे नया&lt;br /&gt;पिता हैं साथ तो पुत्र तन्‍हा नहीं होता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-8887642455109021245?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2010/01/blog-post.html</link><author>avinashvachaspati@gmail.com (अविनाश वाचस्पति)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/Sz2ppfoi24I/AAAAAAAACF4/H6EUAPO-BmE/s72-c/%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-595712384019386730</guid><pubDate>Wed, 30 Dec 2009 16:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-01T13:01:50.541+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>सोनल पंवार</category><title>" पापा कब आओगे ?"</title><description>( 9 अगस्त 2009 मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था क्योंकि उस दिन मैंने अपने पापा को हमेशा के लिए खो दिया ! पापा अब कभी नहीं आयेंगे लेकिन फिर भी मुझे हमेशा पापा का इंतज़ार रहेगा ! शायद ये इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं होगा ! )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ पापा कब आओगे ? “&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पापा कब आओगे ?&lt;br /&gt;जाने कब से ढूंढ रही हूँ&lt;br /&gt;अपनों में और सपनों में ,&lt;br /&gt;इन पलकों की छाँव तले&lt;br /&gt;क्या एक झलक ना दिखलाओगे ?&lt;br /&gt;सच बोलो ना पापा मुझसे ,&lt;br /&gt;पापा कब आओगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको याद करके माँ&lt;br /&gt;हर दिन है रोया करती ,&lt;br /&gt;आपकी यादों में वो&lt;br /&gt;हर पल है खोया करती ,&lt;br /&gt;यादों के इन झरोंखों से बाहर&lt;br /&gt;क्या आप कभी ना आओगे ?&lt;br /&gt;सच बोलो ना पापा मुझसे ,&lt;br /&gt;पापा कब आओगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके बिना सूना है घर-आँगन ,&lt;br /&gt;आपके बिना सूना है ये जीवन ,&lt;br /&gt;क्या अपनी आवाज़ इस घर-आँगन में&lt;br /&gt;फिर से नहीं सुनाओगे ?&lt;br /&gt;सच बोलो ना पापा मुझसे ,&lt;br /&gt;पापा कब आओगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या रूठे हो पापा मुझसे&lt;br /&gt;या खुशियाँ हमसे रूठ गई है ,&lt;br /&gt;इन रूठी खुशियों को क्या&lt;br /&gt;फिर से नहीं मनाओगे ?&lt;br /&gt;सच बोलो ना पापा मुझसे ,&lt;br /&gt;पापा कब आओगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानती हूँ जीवन की इस सच्चाई को&lt;br /&gt;कि आप कभी ना आओगे ,&lt;br /&gt;फिर भी आँखों में छिपे इस इंतज़ार को&lt;br /&gt;क्या कभी ना ख़त्म करवाओगे ?&lt;br /&gt;सच बोलो ना पापा मुझसे ,&lt;br /&gt;पापा कब आओगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पापा आप कब आओगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  - सोनल पंवार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-595712384019386730?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html</link><author>spsenoritasp@gmail.com (sonal)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-3493901183837573685</guid><pubDate>Wed, 23 Dec 2009 03:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-23T09:08:20.795+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>hindi geet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>acharya sanjiv 'salil'.</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>samyik hindi kavita</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>contemporary hindi poetry</category><title>स्मृति दीर्घा:  संजीव 'सलिल'</title><description>स्मृति दीर्घा:&lt;br /&gt;संजीव 'सलिल' &lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन.&lt;br /&gt;मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन..&lt;br /&gt;चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान.&lt;br /&gt;शत वन्दन उनको, दी सीख 'न कर मूरख अभिमान'.&lt;br /&gt;पत्थर परस करे पारस का, सुखमय है संयोग...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;टाँग मार कर कभी गिराया, छुरा पीठ में भोंक.&lt;br /&gt;जिनने अपना धर्म निभाया, उन्नति पथ को रोक.&lt;br /&gt;उन का आभारी, बचाव के सीखे तभी प्रयोग...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;मुझ अपूर्ण को पूर्ण बनाने, आई तज घर-द्वार.&lt;br /&gt;कैसे बिसराऊँ मैं उनको, वे मेरी सरकार.&lt;br /&gt;मुझसे मुझको ले मुझको दे, मिटा रहीं हर सोग...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;बिन शर्तों के नाते जोड़े, दिया प्यार निष्काम.&lt;br /&gt;मित्र-सखा मेरे जो उनको सौ-सौ बार सलाम.&lt;br /&gt;दुःख ले, सुख दे, सदा मिटाए मम मानस के रोग...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;ममता-वात्सल्य के पल, दे नव पीढी ने नित्य.&lt;br /&gt;मुझे बताया नव रचना से थका न अभी अनित्य.&lt;br /&gt;'सलिल' अशुभ पर जयी सदा शुभ, दे तू भी निज योग...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;स्मृति-दीर्घा में आ-जाकर, गया पीर सब भूल.&lt;br /&gt;यात्रा पूर्ण, नयी यात्रा में साथ फूल कुछ शूल.&lt;br /&gt;लेकर आया नया साल, मिल इसे लगायें भोग...&lt;br /&gt;***********&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-3493901183837573685?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-6083785625759149094</guid><pubDate>Sun, 13 Dec 2009 04:31:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-13T10:01:43.163+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>खुली खिड़की</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>कुलवंत हैप्पी</category><title>मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स</title><description>&lt;a href="http://window84.blogspot.com/2009/12/blog-post.html"&gt;खुली खिड़की से कुलवंत हैप्पी&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले मैं अहमदाबाद के रेलवे स्टेशन पर खड़ा बठिंडा को जाने वाली रेलगाड़ी का इंतजार कर रहा था, मैं खड़ा था, लेकिन मेरी नजर इधर उधर जा रही थी, लड़कियों को निहारने के लिए नहीं बल्कि कुछ ढूंढने के लिए, जो खोया भी नहीं था। इतने में मेरी निगाह वहां पर स्थित एक किताब स्टॉल पर गई, मैं तुरंत उसकी तरफ हो लिया, जब पत्नी साथ होती है तब मैं खाने पीने के अलावा शायद किसी और वस्तु पर पैसे खर्च कर सकता हूं, इसलिए हर यात्रा के दौरान मुझे किताबें या मैगजीन खरीदने का शौक है। इस बार मैंने अपने इस सफर के लिए 'आह!जिन्दगी' को चुना, मैंने जब उसको खोला तो मैं सबसे पहले उस लेख पर गया, जो महान फुटबाल खिलाड़ी माराडोना पर लिखा गया था, इसको लेख को पढ़ते हुए मुझे मेरे पिता का अतीत याद आ गया, उनका संघर्ष याद आ गया। वो माराडोना की तरह फुटबालर नहीं हैं, वे तो आम इंसान हैं। इस लेख में माराडोना की तुलना एक ऐसे पक्षी (फीनिक्स) के साथ की गई थी, जो अपनी ही राख से पुन:जीवित हो उठा है, इस तुलना ने मुझे मेरे पिता के संघर्ष के उन दिनों की याद दिला दी, जब वक्त ने कहा, "अब तो हेमराज खत्म हो गया", लेकिन वे फिर से इस कल्पित पक्षी की तरह खड़े हुए और जुट गए। इस लेख में माराडोना के बारे में लिखा था, लेकिन मुझे मेरे पिता का संघर्ष ही याद आ रहा था, मुझे लगा कि शायद इस लेख को मेरे लिए लिखा गया। मेरे पिता का जन्म एक बड़े पंडित परिवार में हुआ, लेकिन उनके पिता की बे-वक्ती मौत ने उनको दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया, लालची लोगों ने उनका सोना(जायादाद) कौड़ियों का भाव खरीद लिया। खुद के गांव में रहकर काम करने की बजाय मामा के गांव चले गए, कई साल वहां रहे, लेकिन खुद के लिए कुछ नहीं, मामा के बच्चों के लिए कई एकड़ जमीन तैयार कर दी, जब जवान हुए तो हाथ में कुछ ही जमीन बची।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उस जमीं पर खेती शुरू की तो कुछ साल बाद मां को बेटे का मोह आने लगा, उन्होंने मेरे पिता को शहर बुला लिया, चलो तीनों भाईयों की तरह इसको भी सरकारी नौकरी पर अटक दें, लेकिन किस्मत देखो, तीन बार सरकारी नौकरी मिली और चली गई। सबको चिंता हो रही थी, अब क्या होगा, बच्चे बढ़े हो रहें और शहर में तो महंगाई बहुत ज्यादा है। लेकिन सरकारी नौकरी से ऊब चुके मेरे पिता ने अब पशु व्यापार शुरू कर दिया, घर में अच्छे पैसे आने लगे, लग रहा था कि अब दिन सुनहरे आ गए, बुरा वक्त टल गया, मगर बुरा वक्त कहां टलने वाला था, वो तो बड़ा हाथ मारने का इंतजार कर रहा था। मुझे आज भी याद है वो दर्दनाक हादसा, जिसमें एक ट्रक्टर, तीन दोस्त और कई भैंसे खोई मेरे पिता ने, उनकी भी टांग टूट गई थी। सारी कमाई इस हादसे ने छीन ली, और तो और कई महीनों के लिए बिस्तर पर लिटा दिया गया मेरे पिता को, टेंशन फिर से बढ़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ महीनों बाद फिर से बिस्तर छोड़ा और निकल गए कुछ नए जुगाड़ की तरफ, उनको फिर से एक सरकारी नौकरी पर लगा दिया गया, लेकिन काम जमा नहीं, उन्होंने उसको ठोकर मार थी, बस फिर क्या? पूरे परिवार की बातों को अनसुना करते हुए चल दिए उस गांव की तरफ, जहां कभी उनकी जमीनें हुआ करती थी, और आस पास के गांवों में उनके पिता और दादा के नाम का डंका बजा करता था, लोग आज भी याद करते हैं मेरे दादा की घोड़सवारी को। इस गांव में सिर्फ सौ रुपए और एक दो महीनों का राशन लेकर पहुंचे मेरे पिता, शहर में चिंता थी कि अब इसका होगा क्या? इसको खेती के लिए वहां जमीं कौन देगा। लेकिन एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुलता भी है। इस गांव में मेरे पिता को उनके चचेरे भाई की जमीं 50-50 पर करने के लिए मिल गई और कुछ जमीं हमने ठेके पर ले ली। जो जमीं हिस्से (50-50) पर मिली थी, वो जमीं ठीक ठीक थी, लेकिन मेरे पिता की मेहनत ने उसको सोना बना दिया। जब वो सोने में तब्दील हो गई तो चचेरे भाई का दिमाग खराब हो गया, मन में लालच आ गया, वो हिस्से पर देने के बजाय ठेके पर देने की बात करने लगा, लेकिन उसने ठेका इतना बोला कि पूरे गांव में उतना ठेका किसी जमीं का न था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने वो जमीं छोड़ दी, गुस्सा आ रहा था, लेकिन मेरे पिता की जिन्दगी में धोखे ही धोखे लिखें हैं, ये तो मैं अच्छी तरह जानता हूं। अगर वो जीवनी लिखें बैठे तो शायद ही कोई अपना होगा, जिसने उसके साथ धोखा न किया हो, शायद उन लोगों में मेरी मां सबसे पहले आएगी, जिसने अंतिम सांसों तक मेरे पिता को धोखा नहीं दिया। इसके बाद एक और जमीं हिस्से पर मिली, जो सोना होते हुए भी पित्तल के भाव बिक रही थी, इस जमीं का मालक एक सीधा सादा साधारण व्यक्ति था, जिसको दुनियादारी नहीं आती थी, बस नशा खिलाओ, जो मर्जी पाओ। उसकी पत्नी थोड़ी समझादार थी, उसने कहा कि अगर बाबा आप मेरे खेतों में काम करना चाहते हैं तो मुझे खुशी हो गई। शायद गांव छोड़ने से पहले हमको उस घर का भला करना ही था, ये मेरे गांव में अंतिम साल थे। मेरे पिता ने हां कह दिया, लेकिन लोग मुझे पकड़ पकड़ कह रहे थे, तेरे पिता को बोल, वो जमीं कचरा है, और कचरे में हीरे मोती नहीं मिलते। मेरे पिता मेरी कहां मानने वाले थे, वो मुझे और मजदूरों को लेकर जुट गए काम में, उनको विश्वास था कि वो इसको सोना बना देंगे, अगले साल वो ही हुआ, जो जमीं गांव के लोगों के लिए कचरा थी, वो आज सोना हो चली थी, सब को इंतजार था कि ये लोग जमीं कब छोड़ेंगे और हमको कब मिलेगी। सबको इंतजार था, मेरे द्वारा गांव छोड़ने का, क्योंकि मुझे अगर शहर में नौकरी मिल गई तो स्वाभिक है कि मेरे पिता मेरे साथ आएंगे। ऐसे में इस जमीं को वो लोग ठेके पर ले लेंगे, लेकिन खेत की मालिकन नहीं चाहती थी कि हम गांव छोड़कर जाएं, क्योंकि उसके घर में खुशियां फिर से लौट आई थी, उसके उतरे हुए चेहरे की रंगत फिर लौट आई थी, मगर मैं उस गांव में कैसे रुकता, मेरे पिता की जमीनें तो लोग खा चुके थे। ऐसे दूसरों के खेतों में मर मर कमाई करने से क्या होने वाला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मां की मौत के बाद मेरे पिता भी शहर आ गए, तीन साल पहले। वो यहां भी अपना ही काम शुरू करने वाले थे, लेकिन घर परिवार वालों ने कहा कि जो तुम्हारे पैसे हैं, वो तुम को खर्च ने के लिए नहीं मिलेंगे, क्योंकि तुम्हारी बेटी की शादी करनी बाकी है। अब वो फिर मुश्किल में आ गए, मामा ने उनको एक नौकरी पर लगवा दिया, जिसको लेकर मैंने एतराज जताया, वो नौकरी करने लायक नहीं थी, और तो और मामा ने यहां तक कह दिया कि मालक को मत बताना तुम मेरे जीजा हो। इस बात ने मेरे पिता के मन और दुखी कर दिया। फिर क्या, उनके भीतर का फीनिक्स फिर जिन्दा हो गया और अगले छ: महीनों में मेरे पिता ने अपना नया ट्रैक्टर ट्राली लाकर खड़ा कर दिया, जो अब चल रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-6083785625759149094?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/12/blog-post.html</link><author>sharma.kulwant84@gmail.com (Kulwant Happy)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-8434856412990039673</guid><pubDate>Tue, 08 Dec 2009 15:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-08T21:11:37.894+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>ज्ञानवाणी</category><title>"कुछ सूत्र"  (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")</title><description>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: #741b47;"&gt;&lt;span style="background-color: yellow;"&gt;!! अनमोल बातें !!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;(1)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;बच्चों को दण्ड नही दिशाएँ दें!&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: magenta;"&gt;(अज्ञात)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;(2)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;अच्छी बात बच्चे की भी मान लो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;लेकिन&amp;nbsp;बुरी बात फरिश्ते की भी मत मानो!&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: magenta;"&gt;(अज्ञात)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;(3)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;प्रणाम लेने का अधिकार उसी का है,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;जो प्रणाम करने वाले से अधिक योग्य हो!&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: magenta;"&gt;(अज्ञात)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;(4)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;वही श्रेष्ठ है जो पढ़ता है!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;ज्ञान बाँटने से बढ़ता है!!&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; font-family: Arial; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; font-family: Arial; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; font-family: Arial; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: magenta;"&gt;(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-family: Arial;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-family: Arial;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; white-space: pre;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 0px; -webkit-border-vertical-spacing: 0px; font-family: 'Times New Roman'; white-space: normal;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;(5)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-family: Arial;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;धन पा जाना बहुत सुलभ है!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-family: Arial;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;सज्जन बन पाना दुर्लभ है!! &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-family: Arial;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="color: magenta;"&gt;(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: magenta; font-family: Arial;"&gt;&lt;span style="-webkit-border-horizontal-spacing: 2px; -webkit-border-vertical-spacing: 2px; font-size: x-large; white-space: pre;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-8434856412990039673?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/12/6.html</link><author>roopchandrashastri@gmail.com (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-5625828838822948025</guid><pubDate>Wed, 25 Nov 2009 04:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-25T10:09:04.848+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>geet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>shokgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>navgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>smriti geet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>acharya sanjiv 'salil'</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>samyik hindi kavita</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>contemporary hindi poetry</category><title>स्मृति गीत: तुम जाकर भी / गयी नहीं हो... संजीव 'सलिल'</title><description>स्मृति गीत:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूज्य मातुश्री स्व. शांतिदेवी की प्रथम बरसी पर-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव 'सलिल' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम जाकर भी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गयी नहीं हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;बरस हो गया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हें न देखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिति न किंचित&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्मृति रेखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिदिन लगता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेर रही हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर हुई, पथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेर रही हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोदी ले &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझको दुलरातीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैया मेरी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बसी यहीं हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम जाकर भी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गयी नहीं हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच घुटने में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीर बहुत थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन तुममें &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीर बहुत थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डगर-मगर उस &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोर नहाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रभु को जी भर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोग लगाया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाई न औषधि &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धरे कहीं हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम जाकर भी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गयी नहीं हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरी, कँपा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारा भू मंडल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युग सम बीता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पखवाडा-पल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँख बोलती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिव्हा चुप्प थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन आशा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुई गुप्प थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं रहीं पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहीं हो &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाकर भी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गयी नहीं हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-5625828838822948025?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/11/blog-post_25.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-1583343640023489759</guid><pubDate>Mon, 23 Nov 2009 19:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-24T00:43:18.955+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>shokgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>navgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>smriti geet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>acharya sanjiv 'salil'</category><title>शोकगीत: नाथ मुझे क्यों / किया अनाथ?  संजीव 'सलिल'</title><description>पूज्य मातुश्री स्व. शांति देवि जी की प्रथम बरसी पर शोकगीत:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाथ मुझे क्यों / किया अनाथ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव 'सलिल' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाथ ! मुझे क्यों&lt;br /&gt;किया अनाथ?...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;छीन लिया क्यों &lt;br /&gt;माँ को तुमने?&lt;br /&gt;कितना तुम्हें &lt;br /&gt;मनाया हमने?&lt;br /&gt;रोग मिटा कर दो &lt;br /&gt;निरोग पर-&lt;br /&gt;निर्मम उन्हें &lt;br /&gt;उठाया तुमने.&lt;br /&gt;करुणासागर!&lt;br /&gt;दिया न साथ.&lt;br /&gt;नाथ ! मुझे क्यों&lt;br /&gt;किया अनाथ?...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;मैया तो थीं&lt;br /&gt;दिव्य-पुनीता.&lt;br /&gt;मन रामायण,&lt;br /&gt;तन से गीता.&lt;br /&gt;कर्तव्यों को &lt;br /&gt;निश-दिन पूजा.&lt;br /&gt;अग्नि-परीक्षा &lt;br /&gt;देती सीता.&lt;br /&gt;तुम्हें नवाया&lt;br /&gt;निश-दिन माथ.&lt;br /&gt;नाथ ! मुझे क्यों&lt;br /&gt;किया अनाथ?...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;हरी! तुमने क्यों&lt;br /&gt;चाही मैया?&lt;br /&gt;क्या अब भी &lt;br /&gt;खेलोगे कैया?&lt;br /&gt;दो-दो मैया &lt;br /&gt;साथ तुम्हारे-&lt;br /&gt;हाय! डुबा दी &lt;br /&gt;क्यों फिर नैया?&lt;br /&gt;उत्तर दो मैं&lt;br /&gt;जोडूँ हाथ.&lt;br /&gt;नाथ ! मुझे क्यों&lt;br /&gt;किया अनाथ?...&lt;br /&gt;*&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-1583343640023489759?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-727276391083021120</guid><pubDate>Thu, 19 Nov 2009 19:07:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-20T00:37:16.716+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>geet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>navgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>acharya sanjiv 'salil'</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>samyik hindi kavita</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>contemporary hindi poetry</category><title>नवगीत: कौन किताबों से/सर मारे?...   आचार्य संजीव 'सलिल'</title><description>नवगीत:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आचार्य संजीव 'सलिल'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन किताबों से &lt;br /&gt;सर मारे?...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;बीत गया जो&lt;br /&gt;उसको भूलो.&lt;br /&gt;जीत गया जो &lt;br /&gt;वह पग छूलो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निज तहजीब&lt;br /&gt;पुरानी छोडो.&lt;br /&gt;नभ की ओर&lt;br /&gt;धरा को मोड़ो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जड़ को तज&lt;br /&gt;जडमति पछता रे.&lt;br /&gt;कौन किताबों से &lt;br /&gt;सर मारे?...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;दूरदर्शनी &lt;br /&gt;एक फलसफा.&lt;br /&gt;वही दिखा जो&lt;br /&gt;खूब दे नफा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले-बुरे में&lt;br /&gt;फर्क न बाकी.&lt;br /&gt;देख रहे &lt;br /&gt;माँ में भी साकी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूह बेचकर &lt;br /&gt;टका कमा रे... &lt;br /&gt;कौन किताबों से &lt;br /&gt;सर मारे?...&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;बटन दबा &lt;br /&gt;दुनिया हो हाज़िर.&lt;br /&gt;अंतरजाल &lt;br /&gt;बन गया नाज़िर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर इंसां &lt;br /&gt;बन गया यंत्र है. &lt;br /&gt;पैसा-पद से &lt;br /&gt;तना तंत्र है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निज ज़मीर बिन&lt;br /&gt;बेच-भुना रे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-727276391083021120?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/11/blog-post_20.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-1531134634026658931</guid><pubDate>Thu, 12 Nov 2009 22:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-13T04:26:00.332+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>सुभाष नीरव</category><title>स्‍मृति-शेष पिता ! (सुभाष नीरव)</title><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SvxNxf7RH8I/AAAAAAAAB48/BezspYo26Jw/s1600-h/Neerav%2Bphoto.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 80px; height: 84px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SvxNxf7RH8I/AAAAAAAAB48/BezspYo26Jw/s200/Neerav%2Bphoto.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403279165716766658" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पिता अब नहीं रहे। गत 22 अक्‍तूबर बृहस्‍पतिवार रात्रि 10.30 बजे) उन्‍होंने मुझसे छोटे दो भाइयों की गोद में अंतिम सांस ली। जीवन भर दुख - तकलीफों और मुश्किलों से लोहा लेने वाले पिता अपनी भयंकर बीमारी से भी अपनी जीर्ण-शीर्ण काया में भी बची खुची शक्ति से चुपचाप जूझते रहे। उन्‍हें दांये फेफड़े में कैंसर था जो अंतिम स्‍टेज पर &lt;a href="http://srijanyatra.blogspot.com/2009/11/blog-post.html"&gt;पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी के लिए यहां क्लिक करें&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-1531134634026658931?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/11/blog-post_13.html</link><author>avinashvachaspati@gmail.com (अविनाश वाचस्पति)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SvxNxf7RH8I/AAAAAAAAB48/BezspYo26Jw/s72-c/Neerav%2Bphoto.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-6383269280900810968</guid><pubDate>Mon, 09 Nov 2009 06:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-09T12:57:58.623+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>पिताजी प्रभाष जोशी</category><title>पिता की याद संदीप जोशी : दैनिक जनसत्‍ता में प्रभाष जोशी के पुत्र ने लिखा है</title><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SvfDikouU0I/AAAAAAAAB3M/3I9LoLSwaqM/s1600-h/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7+%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A5%80.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 101px; height: 121px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SvfDikouU0I/AAAAAAAAB3M/3I9LoLSwaqM/s200/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7+%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A5%80.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5402001276771652418" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/Sve7LtIoPvI/AAAAAAAAB3E/lHG2ksMQlAM/s1600-h/jansatta.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 99px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/Sve7LtIoPvI/AAAAAAAAB3E/lHG2ksMQlAM/s200/jansatta.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401992087822941938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दैनिक जनसत्‍ता के आज दिनांक 9 नवम्‍बर 2009 के अंक में संपादकीय पेज पर उनके सुपुत्र संदीप जोशी को स्‍मृतिलेखा स्‍तंभ के अंतर्गत पढि़ए। &lt;br /&gt;साभार जनसत्‍ता&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-6383269280900810968?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/11/blog-post_09.html</link><author>avinashvachaspati@gmail.com (अविनाश वाचस्पति)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SvfDikouU0I/AAAAAAAAB3M/3I9LoLSwaqM/s72-c/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7+%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A5%80.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>10</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-7913228985981862154</guid><pubDate>Tue, 03 Nov 2009 15:43:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-03T21:13:33.333+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>geet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>shokgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>navgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>smriti geet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>sanjiv 'salil'</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>maa-papa</category><title>स्मृति गीत:  संजीव 'सलिल'</title><description>&lt;b&gt;स्मृति गीत:&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव 'सलिल'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृजन विरासत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमसे पाई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलस सवेरे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उठते ही तुम,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिन आलस्य &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम में जुटतीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिगडी, सनसी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिमटा, चमचा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौके में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाद्यों सी बजतीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर हुई तो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें जगाने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेर-टेर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आवाज़ लगाई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृजन विरासत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमसे पाई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेल निरीक्षण &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर आते थे,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नित सूरज &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उगने के पहले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तव पाबंदी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रम, कर्मठता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;से अपराधी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहते दहले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निज निर्मित&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यक्तित्व, सफलता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकर तुमने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहज पचाई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृजन विरासत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमसे पाई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ!-पापा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकट के संबल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गए छोड़कर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें अकेला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विधि-विधान ने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाय! रख दिया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है झिंझोड़कर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकट झमेला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम बिन &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर त्यौहार अधूरा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुशी पराई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृजन विरासत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमसे पाई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सूनापन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भी हमको &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीना ही होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गए मुसाफिर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमिय-गरल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समभावी हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीना ही होगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल की खातिर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब न &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीश पर छाँव, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूप-बरखा मंडराई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृजन विरासत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमसे पाई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे क्षर थे,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर अक्षर मूल्यों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;को जीते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने देखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी न पाया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ह्रदय-हाथ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पल भर रीते थे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युग ने लेखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधियों का &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संबल दे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रति पल राह दिखाई..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृजन विरासत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमसे पाई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-7913228985981862154?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/11/blog-post.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-321449864444738340</guid><pubDate>Sun, 25 Oct 2009 07:37:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-25T13:07:11.809+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>khamoshi</category><title>सजा तो भुगतनी ही होगी...</title><description>अभी कुछ दिनों पहले मैंने इसी ब्लॉग पर अपने मन के भावो को लिखा था. शीर्षक था &lt;b&gt;&lt;i&gt;"&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;a href="http://pitaajee.blogspot.com/2009/09/blog-post.html"&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;एक पत्र अपने&amp;nbsp;पिताजी के नाम&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;"&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;. &lt;span style="color: red;"&gt;आप लोगों से गुजारिश करूँगा मेरे इस पोस्ट को पढने से पहले आप उसे जरूर पढ़े&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने ही परिवार&amp;nbsp;में तीन&amp;nbsp;भाइयों को इस तरह अलग अलग देखना हमेशा खटकता है मुझे.&amp;nbsp;अभी कुछ दिनों पहले मैं अपने घर गया हुआ था. काफी लम्बे समय&amp;nbsp;बाद जाने का मौका मिला था. सोंच कर गया था इस बार कि कम से कम एक महिना तो घर पर रहूँगा ही. घर पर मेरा स्वागत भी बहुत खूब हुआ. माँ-पापा बहुत खुश थे. शाम में मेरे सबसे बड़े चाचा और चाही भी मुझे मिलने आये. मुझे अच्छा लग रहा था. दिल को सुकून हो रहा था ये जान कर कि वो लोग भी मुझे उतना ही प्यार करते है. पर मेरी आँखें उन्हें देखने को तरस रही थी, मेरे शम्भू चाचा को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन वो हमेशा हमारी अंगुली पकड़कर हमें रोज सुबह जलेबी खिलने ले जाते थे. फिर आज वो क्यों नहीं आये मुझसे मिले&amp;nbsp;अभी तक. दिल बार-बार कह रहा था वो आयेंगे. लेट हो रहे होंगे जलेबी खरीदने में. पर शाम ढलने तक वो नहीं आये. शर्म कि बात तो मेरे लिए ये है कि मैं उनसे मिलने नहीं जा सकता था क्योंकि मुझे उनका घर ही नहीं पता. मुझे क्यों उनका घर तो मेरे पापा और बड़े चाचा को भी नहीं पता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली सुबह मैंने किसी भी तरह उनसे मिलने कि ठान ली. मैंने अपने भाई को फ़ोन किया (जोकि फगवारा, पंजाब में रहता है) और उससे मैंने चाचा का पता पूछा. मेरे घर में एक सिर्फ उसे उनके घर का पता मालूम था. पता जानकार किसी तरह खोजते हुए मैं उनके निवास पर पहुँच ही गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर वहां पहुँचते ही मुझे लगा जैसे मैं जमीन पर गिर जाऊंगा. १६०० स्क्वायर फीट के जमीन में घर कहने को सिर्फ एक झोपडी बनी हुई थी. जिसके तीन दिवार बांस कि लकडियों से बने थे और उन में इतने बड़े-बड़े छेद थे कि उसे दिवार कहूँ या नहीं ये अभी तक नहीं सोंच पाया हूँ. चौथी तरफ एक पक्की दिवार थी जो कि किसी और के मकान की&amp;nbsp;थी जिसे उपयोग किया गया था. छत जरूर कुछ अच्छी लग रही थी. जिसपर शायद हाल ही में टीन के चादर डाले गए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर के अन्दर एक चौकी (बेड) थी जिसपर सिर्फ एक चादर बिझी हुई थी और&amp;nbsp;एक तकिया (बिना खोल का) था. बगल में एक टूटे हुए टेबल पर लगभग 15&amp;nbsp;साल पुराना सूटकेस था जिसके लाक टूटे हुए थे. उस सूटकेस से झाँक रहे थे २-४ कपडे. एक दिवार से एक छोटा सा आइना लटक रहा था और वहीँ बगल में एक छोटी सी कंघी लगी हुई थी. रात की&amp;nbsp;रौशनी करने के लिए किरासन तेल की एक डिबिया. घर में बिजली नहीं, बल्ब नहीं, पंखा, आदि और कुछ भी नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और पल भी वहां रुकना मेरे लिए असंभव सा था. मैं तुंरत वहां से चला आया. रास्ते भर आँखों में मेरे आंसू थे. मैं हैरान था इस बात पर कि एक ही परिवार के तीन भाइयों में इतना अंतर कैसे. मेरे पिताजी पूर्णिया&amp;nbsp;के बड़े लोगों में नहीं आते. एक सरकारी बैंक में क्लर्क है. मेरे बड़े चाचा असाम के एक बड़े सीमेंट फैक्ट्री में काम करते थे. हम सारे भाई बहन अच्छा कमा लेते है. हमारे पास एक छोटा सा अपना घर है, घर में सुख-सुविधाओं की हर वास्तु मौजूद है.&amp;nbsp;पूर्णिया में मेरे माँ-पाप अपने और मेरे बड़े चाचा-चाची अपने घरों में अकेले रहते है. हम सारे भाई-बहन अपनी-अपनी नौकरियों के कारण घर से दूर रहते है. पर हमारे घर में हमारे चाचा के लिए एक छोटा सा कोना नहीं है. घर में कोने की बात तो बाद की है, हमारे दिल में उनके लिए जगह नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक महीने का सोंच कर घर गया था पर एक और दिन से ज्यादा वहां रह नहीं पाया. चाह कर भी कुछ करने से महरूम&amp;nbsp;हूँ. अपने शम्भू चाचा को इस तरह देख नहीं सकता और अपने माँ-पापा के खिलाफ जा नहीं सकता. मेरे शम्भू&amp;nbsp;चाचा की मेरे ख्याल से एक ही गलती है उन्होनो हम लोगों को अपना माना. बचपन में उन्ही का हाथ पकड़कर स्कूल के गेट तक पहुँचता था आज मैं अपना हाथ उन तक नहीं पहुंचा सकता. उनकी इस हालात को देखकर मन में यहीं विचार आते है कि आज तो ठीक है पर उस दिन क्या होगा जब वो खुद से कुछ कर नहीं पाएंगे? अगर कभी उन्हें मौत आ गयी तो मेरे परिवार को तो उसका पता ही न चलेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शभु चाचा आपने बहुत गलत किया जो मेरे पापा को बनाने के लिए आज आप अकेले, तन्हा, बीमार और शायद बर्बाद है. आज मैं खुद कहता हूँ आपको ऐसा नहीं करना चाहिए थे. आपको भी बड़े चाचा की तरह अपने छोटे भाई को घर से निकाल कर सिर्फ अपने बारे में सोंचना चाहिए थे. पर आपने ऐसा नहीं किया. आपने गलती की तो गलती की सजा तो भुगतनी ही होगी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;आप सबसे और सबसे ज्यादा अविनाश वाचस्पति जी से माफ़ी मांगूंगा कि आपके "पिताजी" ब्लॉग पर मैं अपने शम्भू चाचा के दर्द को लिख रहा हूँ, क्योंकि मेरे शम्भू चाचा मेरे लिए मेरे पिता के बाद पिता से कम नहीं...&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;आप सब लोगों को अपने ब्लॉग &lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;a href="http://kucchbaat.blogspot.com/"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;कुछ बात&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt; और &lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;a href="http://ab8oct.blogspot.com/"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;खामोशी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt; पर निमंत्रित करता हूँ. अपने&amp;nbsp;बहुमूल्य &amp;nbsp;विचारों से मेरा मार्ग-दर्शन करे और मुझे बेहतर बनाने में मदद करें&lt;/span&gt;.&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-321449864444738340?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html</link><author>ab8oct@gmail.com (अभिषेक प्रसाद 'अवि')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-1998125571375630157</guid><pubDate>Sat, 17 Oct 2009 07:55:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-17T14:40:32.209+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>पिताजी ललित शर्मा</category><title>पिताजी को जिम्‍मेदारी का दोहरा अहसास</title><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;बात पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश की आज़ादी के युद्ध के समय की है.पापा आप उस युद्ध में गए थे, लड़ने के लिए, मुझे याद है, आपका वो पत्र जो आया था, काफी इंतजार के बाद,जिसका इंतजार पूरा परिवार कर रहा था. दादी हमेशा डाकिये का इंतजार करती थी. कभी तो कोई चिट्ठी लेकर आएगा ? मुझे कुछ सही खबर बताएगा. एक दिन आपका पत्र डाकिया लेकर आया. उसे सभी घर वालों के सामने खोल कर पढ़ा गया.आपने लिखा था, सब कुछ ठीक-ठाक है. दादी के चेहरे पे एक सुकून का भाव था. उस पत्र में लिखी एक बात मुझे आज तक याद आती है.'लल्लू को बाहर मत घूमने देना गर्मी का समय है, तबियत ख़राब&amp;nbsp; हो जायेगी. उसे घर से बाहर मत निकलने देना,बंद करके रखना".आज मैं सोचता हूँ कि कितना ख्याल रखते थे आप हमारा.एक तरफ युद्ध दूसरी तरफ परिवार. और काफी दिनों के बाद एक पत्र एवं उसमें भी मेरी चर्चा. उस समय मुझे लगता था कि मेरे पापा&amp;nbsp; कसाई है मुझे घर से बाहर खेलने भी नहीं जाने देते. और तो और युद्ध में गए हैं, वहां से भी हुकुम मेरे लिए ही आ रहा है. नासमझ था मैं, उस समय मुझे पता नहीं था कि एक पिता की क्या जिम्मेदारी होती है ? आज आप नहीं हैं. तब मुझे आपकी जिम्मेदारियों का अहसास होता है.आप एक नहीं युद्ध के दो-दो मोर्चों पर अपनी लड़ाई लड़ रहे थे और अपने लडाई जीती भी. आज मै एक मोर्चे पर ही अपनी काबिलियत साबित करने के लिए जूते घिस रहा हूँ. लेकिन विजय कहीं नज़र नहीं आती. आज सोचता हूँ, कैसे किया होगा आपने इतना सब ? और जब आप आये उस दीवाली को मैं पटाखों की जिद कर रहा था, आपने मुझे पटाखे दिलाये, २२ रूपये के. कितने सारे पटाखे थे वो, जैसे हम पटाखों की पूरी दुकान ही खरीद कर ले आये हों. एक बड़े बक्से में भर कर दिये थे उसने. उस दीवाली हमने खूब पटाखे चलाये थे.शायद युद्ध की विजय और आपके आने की ख़ुशी के पटाखों में कुछ ज्यादा ही रोशनी एवं आवाज थी. जब -जब दीवाली आती है।&amp;nbsp; मुझे आप खूब याद आते हैं. आज भी आप याद आ रहे हैं.आप दोपहर में मैं जब सोया था तो मुझे सपने में भी सब फौजी ही फौजी दिख रहे थे. उनमें आप भी थे मैं बहुत खुश था कि&amp;nbsp; आज दीवाली है और मेरे पापा फिर वापस आ गए हैं, मुझे पटाखे एवं नए कपडे दिलाने के लिए.क्योंकि जब से आप हमें छोड़ कर गए हैं,&amp;nbsp; तब से हमारी जिन्दगी से रंग-ख़ुशी, वो पटाखों के धमाके, वो रोशनी की लड़ियाँ, वो फुलझडि़यां, सब चले गए. तब से हमने दीवाली पर नए कपडे नहीं पहने है. ना मम्मी ने, ना मेरे छोटे भाई ने, ना मैंने. आज इतने बरसों के बाद&amp;nbsp; भी दीवाली पर वो उमंग और मस्ती कभी नहीं आई और आपके बिना आएगी भी नहीं.मुझे पता है, आप इतनी दूर जा चुके हैं हमसे, जहाँ से वापस आना भी संभव नहीं है.फिर भी हम प्रत्येक दीवाली को आपका इंतजार करते रहेंगे जिन्दगी भर, नए कपडों और आपके प्‍यार भरे, नेह पूरित पटाखों के लिए.......................पापा &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-1998125571375630157?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/10/blog-post_17.html</link><author>noreply@blogger.com (ललित शर्मा)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>9</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-6822262870721162095</guid><pubDate>Fri, 16 Oct 2009 17:22:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-16T22:56:06.161+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>nvgeet</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>maatri jyoti dipak pita</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>get</category><title>दोहा गीत:  मातृ ज्योति- दीपक पिता, acharya sanjiv 'salil'</title><description>दोहा गीत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय विषमता तिमिर पर,&lt;br /&gt;कर दे- साम्य हुलास.. &lt;br /&gt;मातृ ज्योति- दीपक पिता,&lt;br /&gt;शाश्वत चाह उजास....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसने कालिख-तम पिया,&lt;br /&gt;वह काली माँ धन्य.&lt;br /&gt;नव प्रकाश लाईं प्रखर,&lt;br /&gt;दुर्गा देवी अनन्य.&lt;br /&gt;भर अभाव को भाव से,&lt;br /&gt;लक्ष्मी हुईं प्रणम्य.&lt;br /&gt;ताल-नाद, स्वर-सुर सधे,&lt;br /&gt;शारद कृपा सुरम्य.&lt;br /&gt;वाक् भारती माँ, भरें&lt;br /&gt;जीवन में उल्लास.&lt;br /&gt;मातृ ज्योति- दीपक पिता,&lt;br /&gt;शाश्वत चाह उजास...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुख-समृद्धि की कामना,&lt;br /&gt;सबका है अधिकार.&lt;br /&gt;अंतर से अंतर मिटा,&lt;br /&gt;ख़त्म करो तकरार.&lt;br /&gt;जीवन-जगत न हो महज-&lt;br /&gt;क्रय-विक्रय व्यापार.&lt;br /&gt;सत-शिव-सुन्दर को करें&lt;br /&gt;सब मिलकर स्वीकार.&lt;br /&gt;विषम घटे, सम बढ़ सके,&lt;br /&gt;हो प्रयास- सायास.&lt;br /&gt;मातृ ज्योति- दीपक पिता,&lt;br /&gt;शाश्वत चाह उजास....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;**************&lt;br /&gt;= दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-6822262870721162095?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/10/acharya-asnjiv-salil.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-7275821250332185954</guid><pubDate>Sun, 04 Oct 2009 14:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-04T19:59:18.506+05:30</atom:updated><title>हमारे पिता जी की फनी बातें</title><description>&lt;div style="background-color: white;"&gt;&lt;span style="background-color: yellow;"&gt;ब्लोगवाणी के सथागित होने पर ब्लोगवाणी के पाठक वर्ग,और लेखको में निराशा फैल गयी थी, सोचा कि माहौल को कुछ हल्का फुल्का कर दूं, वैसे तो हमारे पिता जी का देहावसान ८२ वर्ष की आयु में हो गया था, लेकिन आज भी उनकी कुछ यादें मन को गुदगुदा जातीं है, वोह गुलाम देश के अंग्रेजो से बहुत प्रभावित थे, उनका जन्म मथुरा नगरी में हुआ था,और उनको M.A. अंग्रजी में करने के लिए अल्ल्हाबाद भेजा गया था, अगर किसी साइनबोर्ड पर कुछ अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओँ में लिखा होता था,तो उनको हिंदी में पड़ना गवारा नहीं था, बस वोह अंग्रेजी में ही पड़ते थे, और यह अंग्रेजी भी विचत्र भाषा हैं,अगर put पुट है,तो but बट हैं, एक बार पिता जी को किसी पुस्तक की आवयश्कता पड़ी तो वोह चल पड़े,वोह किताब लेने,घुमते,घुमते उनकी निगाह किसी साइनबोर्ड पर पड़ी जिस पर अंग्रेजी में kitabistan लिखा हुआ था,और उसके ठीक नीचे लिखा हुआ था किताबिस्तान,पर पिता जी को हिंदी में पड़ना गवारा नहीं था,लिहाजा उन्होंने उसको अंग्रेजी में पड़ा कइटबसतन,और बिना पुस्तक लिए पहुँच गये वापिस अपने छात्रावास, उन्होंने अपने सहपाठियों से पुछा अमुक पुस्तक कहाँ मिलेगी,तो किसी उनके सहपाठी ने उस किताबिस्तान का रास्ता बता दिया, वोह वहीँ पहुंचे और अपनी आवयश्कता की पुस्तक खरीद लाये |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white;"&gt;&amp;nbsp;यह तो उनका बताया हुआ किस्सा है, उनका अंग्रेजी बोलने के कुछ हास्यापद किस्से तो मेरे साथ भी हुए थे, उनमे से दो का जिक्र कर रहा हूँ, हम लोग उन दिनों छोटे,छोटे हुआ करते थे, उस ज़माने में दूरदर्शन तो होता नहीं था,बस रेडियो ही एक मात्र मनोरंजन का साधन था,और रेडियो में एक सुई होती थी,जो की एक डोरी के ऊपर चलती थी, इसी से रेडियो स्टेशन का निर्धारण होता था,एक बार वोह डोरी टूट गयी, तो वोह मुझे बोले लाला को बुला लाओ,वोह लाला परचून की दूकान करता था,और उसको रेडियो ठीक करने का अनुभव भी था,में उस लाला के पास पहुंचा और मैंने उस लाला से उन्ही के शब्दों में कहा "रेडियो का Dial Cord टूट गया",पापा बुला रहें हैं,अब लाला हैरान,परेशान मेरे साथ अपने औजार लेकर के चलने लगा, उसको डायल कॉर्ड समझ नहीं आया था, मेरे साथ चलते चलते वोह अचानक रूक कर बोला ठेर&amp;nbsp; जाओ में अभी मल्टीमीटर ले कर आता हूँ,पता नहीं डायल कॉर्ड क्या होता है,खेर वोह घर पर आया उसने रेडियो की डोरी ठीक करी, और मुझ से बोला यह दूकान पर ही बता देते डोरी टूट गयी है |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white;"&gt;&amp;nbsp; इसी प्रकार मुझे एक और किस्सा याद आ रहा हूँ, मेरी नयी,नयी नौकरी लगी थी,और हम लोगों को कोन्वेयोंस अलओनस मिलता था,उस जमाने में यजदी बाईक का चलन था, मैंने भी खरीद ली,अब मुझे उस पर पिट्ठू लगाने की आवयश्कता पड़ी, सो पिता जी भी चल पड़े मेरे साथ पिट्ठू लेने, और दूकान वाले से बोले हैबेरसेक देना,दूकान वाला बोला "बाउजी यह हेबरसेक क्या होता है?", मैंने जब कहा एक "पिट्ठू देना" तो उसने मुझे पिट्ठू दे दिया,पिता जी हर एक से अंग्रेजी के शब्दों में बात करते थे, चाहें अगला समझे या ना समझे |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white;"&gt;&amp;nbsp;अपनी बड़ती उम्र के कारण वोह कुछ ऊँचा सुनने लगे थे,वैसे तो उन्होंने ऊँचा सुनने की मशीन खरीद रखी थी, पर उसका प्रयोग कम ही करते थे, अक्सर हम लोग उनके साथ उनकी गाड़ी में बैठ कर के घुमने जाया करते थे, और उनका ड्राईवर गाड़ी चलाया करता था,एक बार सदा की भांति उनके साथ घुमने जाया करते थे, गाड़ी के डेक में उस समय का गाना बज रहा था,"दिल देने की रुत आई", तो उन्होंने पता नहीं क्या सुना, अपने ड्राईवर चुन्नू से बोले "क्यों बे चुन्नू क्या कह रही है,दिल्ली में लुगाई",हम लोगों का हंसते,हंसते बुरा हाल और चुन्नू के हाथ से तो गाड़ी का स्टीरिंग हंसते,हंसते छुट गया |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white;"&gt;&amp;nbsp;अविनाश जी से शमा याचना के साथ इस पोस्ट का अंतिम पारूप दे रहा हूँ, क्योंकि अगर उनके ब्लॉग&amp;nbsp; पिताजी में लिखता तो उसको एडिट करना कठिन हो जाता, बस अंत में यही कहना चाहता हूँ,हंसते रहो,हंसाते रहो, और ब्लोगवाणी के पुन: लौटने पर खुशियाँ मनाओ,और ऐसा कोई कार्य ना करो जिससे ब्लोगवाणी को अघात पहुंचे |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; color: #f1c232;"&gt;&amp;nbsp; सबके होंठो पर मुस्कान देखने की इच्छा से इस पोस्ट का पटाक्षेप | |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #f1c232;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-7275821250332185954?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/10/blog-post_04.html</link><author>vinay532007@gmail.com (vinay)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-2459423383411897904</guid><pubDate>Fri, 02 Oct 2009 04:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-02T10:17:38.882+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>राष्‍ट्रपिताजी</category><title>राष्‍ट्रपिताजी महात्‍मा गांधी  (अविनाश वाचस्‍पति)</title><description>बापू सिर्फ मेरे बापू ही नहीं हैं &lt;div&gt;वे समूचे राष्‍ट्र के पिताजी हैं &lt;/div&gt;&lt;div&gt;पर कहते सब हैं, सब उन्‍हें &lt;/div&gt;&lt;div&gt;वे राष्‍ट्रपिता हैं ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कहते नहीं हम, पता नहीं क्‍यों &lt;/div&gt;&lt;div&gt;राष्‍ट्रपिताजी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;लगाना चाहिए जी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आप भी सहमत होंगे जी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;पर प्‍यार में सब माफ होता है ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यही सच्‍चाई है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;अहिंसा है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;माफ कर दिया &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जिसने माफी मांगी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसकी सच्‍चाई जाग गई &lt;/div&gt;&lt;div&gt;और जिसने माफ किया &lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसकी अहिंसा आग भई। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आग भी अहिंसक होती है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसके भी गर चाहिए सबूत &lt;/div&gt;&lt;div&gt;तो सोचिये विचारिये &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आग चाहे सूरज की हो &lt;/div&gt;&lt;div&gt;या पेट की &lt;/div&gt;&lt;div&gt;वो जब तपाती है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जो सिर्फ चपाती भाती है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पिताजी शब्‍द में भी भरपूर है आग &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जाग मानुष तुरंत आंखें खोल जाग &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आग जो संस्‍कारों की है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आग जो सुविचारों की है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आग जो शुद्धता की है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आग जो निजता है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सदा आग वो पावन है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आग वही ऐवन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तो राष्‍ट्रपिताजी के कहे हुए को &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कर लो आत्‍मसात &lt;/div&gt;&lt;div&gt;तो जीवन का साथ &lt;/div&gt;&lt;div&gt;रूपहला हो जाएगा &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सत्‍य और अहिंसा का मनभावन &lt;/div&gt;&lt;div&gt;स्‍वरूप उज्‍ज्‍वल हो जाएगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;झलकने चमकने लगे आब &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सत्‍य अहिंसा की तो पुत्र &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुपुत्र कहलाएगा &lt;/div&gt;&lt;div&gt;और एक दिन &lt;/div&gt;&lt;div&gt;राष्‍ट्रपुत्र बनने की ओर &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सार्थक कदम बढ़ाएगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SsWFc_VMUoI/AAAAAAAABtY/MRE4aSbIBq8/s200/googlegandhi.JPG" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-2459423383411897904?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/10/blog-post.html</link><author>avinashvachaspati@gmail.com (अविनाश वाचस्पति)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_m4MOFUJszMM/SsWFc_VMUoI/AAAAAAAABtY/MRE4aSbIBq8/s72-c/googlegandhi.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>14</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-4425852381507811942</guid><pubDate>Thu, 24 Sep 2009 16:25:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-24T21:55:20.813+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>स्मृति गीत- पितृव्य हमारे नहीं रहे.... आचार्य संजीव 'सलिल'</category><title>स्मृति गीत- पितृव्य हमारे नहीं रहे.... आचार्य संजीव 'सलिल'</title><description>स्मृति गीत-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पितृव्य हमारे &lt;br /&gt;नहीं रहे.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आचार्य संजीव 'सलिल'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे &lt;br /&gt;आसमान की &lt;br /&gt;छाया थे.&lt;br /&gt;वे &lt;br /&gt;बरगद सी &lt;br /&gt;दृढ़ काया थे.&lt;br /&gt;थे-&lt;br /&gt;पूर्वजन्म के &lt;br /&gt;पुण्य फलित &lt;br /&gt;वे,&lt;br /&gt;अनुशासन &lt;br /&gt;मन भाया थे.&lt;br /&gt;नव&lt;br /&gt;स्वार्थवृत्ति लख &lt;br /&gt;लगता है &lt;br /&gt;भवितव्य हमारे &lt;br /&gt;नहीं रहे.&lt;br /&gt;पितृव्य हमारे &lt;br /&gt;नहीं रहे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे &lt;br /&gt;हर को नर का &lt;br /&gt;वन्दन थे.&lt;br /&gt;वे &lt;br /&gt;ऊर्जामय &lt;br /&gt;स्पंदन थे. &lt;br /&gt;थे &lt;br /&gt;संकल्पों के &lt;br /&gt;धनी-धुनी-&lt;br /&gt;वे &lt;br /&gt;आशा का &lt;br /&gt;नंदन वन थे.&lt;br /&gt;युग &lt;br /&gt;परवशता पर&lt;br /&gt;दृढ़ प्रहार. &lt;br /&gt;गंतव्य हमारे &lt;br /&gt;नहीं रहे.&lt;br /&gt;पितृव्य हमारे &lt;br /&gt;नहीं रहे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे &lt;br /&gt;शिव-स्तुति &lt;br /&gt;का उच्चारण.&lt;br /&gt;वे राम-नाम&lt;br /&gt;भव-भय तारण.&lt;br /&gt;वे शांति-पति &lt;br /&gt;वे कर्मव्रती.&lt;br /&gt;वे &lt;br /&gt;शुभ मूल्यों के &lt;br /&gt;पारायण.&lt;br /&gt;परसेवा के &lt;br /&gt;अपनेपन के &lt;br /&gt;मंतव्य हमारे &lt;br /&gt;नहीं रहे. &lt;br /&gt;पितृव्य हमारे &lt;br /&gt;नहीं रहे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-4425852381507811942?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/09/blog-post_24.html</link><author>salil.sanjiv@gmail.com (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>13</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-6797040309899080733</guid><pubDate>Wed, 23 Sep 2009 11:04:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-23T16:34:19.162+05:30</atom:updated><title>एक खत पापा के नाम</title><description>मैं, अपने माता-पिता और भाई के साथ रहता हूँ और आज भी मेरा जेबखर्च पिताजी ही देते हैं। हम दोनों भाई जब तक देर शाम पिताजी के पैर नही दबा ले हम सो नही पाते हैं और पिताजी भी। आब तो हम सभी के संवाद का एक जरिया बन चुका है पिताजी के पैर दबाना कैसी भी नाराजी हो रात को पिताजी के बिस्तर पर खत्म।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौकरी के सिलसिले में, मैं हैदराबाद रहा १९८५ में, फिर सागर(म.प्र.) और उसके आस-पास छतरपुर, टीकमगढ़ आदि। उम्र के ४४ वें साल तक कुल जमा तीन चिट्ठियाँ ही लिख पाया घर को, या यूँ कह ले कि आदत ही नहि बनी चिट्ठियाँ लिखने की, यह मेरी एक सबसे बड़ी कमजोरी आज भी है। प्रस्तुत कविता गतवर्ष मैंने मुम्बई प्रवास के दौरान हॉटेल में लिखी थी और वहीं से चिट्ठी के रूप में घर भेज दी थी। इस खतनुमा कविता को घर के सभी सद्स्यों ने सराहा था। और लौट कर आने पर पिताजी श्री रामप्रकाश तिवारी "निर्मोही" (जो कि हिन्दी के स्थापित कहानीकार रहे है ६०~७० के दशक में) ने विशेष प्यार जताया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह आप सबसे बाँटते हुये मुझे बड़ी खुशी होती है कि मैं आज भी अपने पापा का मुन्ना हूँ और यही ईश्वर से मांगता हुँ कि मुन्ना ही बने रहूँ और अपने पिताजी के पैर यूँ ही हम दोनों भाई दबाते रहे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सादर,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://tiwarimukesh.blogspot.com/"&gt;मुकेश कुमार तिवारी&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;------------------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक खत पापा के नाम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पापा,&lt;br /&gt;कोई जमा तेईस सालों बाद&lt;br /&gt;मुझे आज यह लगा कि&lt;br /&gt;अपनी राजी-खुशी का हाल लिखूं&lt;br /&gt;दीगर समाचार लिखूं / &lt;br /&gt;लिखूं कि बारिश कैसी है / यहाँ मौसम कैसा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं,&lt;br /&gt;अपनी जिन्दगी में शायद &lt;br /&gt;यही नही सीख पाया हूँ, चिट्ठी लिखना &lt;br /&gt;ना जाने उम्र के किस पड़ाव पर अक्ल आयेगी&lt;br /&gt;कभी तो यह लगता है कि&lt;br /&gt;माँ, ठीक ही कहती है, शायद &lt;br /&gt;मुन्ना तुम्हें कौन पढा-लिखा कहेगा&lt;br /&gt;इतने बड़े हो गये हो और अक्ल धेले भर की नही है&lt;br /&gt;निरे मोधू के मोधू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे,&lt;br /&gt;जहाँ तक याद है &lt;br /&gt;गिनती की कुल जमा तीन या चार &lt;br /&gt;चिट्ठियाँ ही मिली होंगी मेरी अब तक&lt;br /&gt;एक हैदराबाद से / एक सागर से /&lt;br /&gt;एक-दूसरी टीकमगढ से &lt;br /&gt;सिर्फ अपने आने की / भेजे जाने की &lt;br /&gt;औपचारिकतायें निभाती चिट्ठियाँ &lt;br /&gt;बिना किसी संबोधन के भला कोई लिखता है किसी को &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसी, &lt;br /&gt;चिट्ठियाँ जो लिखते हैं घर से बाहर जाने वाले बच्चे &lt;br /&gt;माँ-बाप को सादर चरण स्पर्श / बड़ों को यथोचित / &lt;br /&gt;बच्चों को प्यार / अपने हाल-चाल / &lt;br /&gt;पूरे मोहल्ले का समाचार पूछती &lt;br /&gt;वो चिकनी-चुपड़ी सी बातें&lt;br /&gt;यत्र कुशलं अस्तुअ तत्र...............&lt;br /&gt;ऐसे ही किसी वाक्य पर विश्राम लेती लेखनी &lt;br /&gt;यदि, ठीक तरह से जांचा जाये तो &lt;br /&gt;ऐसा लगे कि व्याकरण की किताब से &lt;br /&gt;किसी पन्ने को भेजा गया हो &lt;br /&gt;खत के रूप में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब,&lt;br /&gt;किसी दिन मैं सीखूंगा &lt;br /&gt;आपसे चिट्ठी लिखना "उसके खत" की तरह&lt;br /&gt;और यह भी सीखूंगा कि &lt;br /&gt;मैं, लिख सकूं एक अदद चिट्ठी &lt;br /&gt;जिसमें माँ हो / भाई हो / बहन हो / &lt;br /&gt;बीबी हो / बच्चे हों और &lt;br /&gt;वह सब भी हों जो मिलकर &lt;br /&gt;परिवार बनाते हैं / जोड़ते हैं एक दूसरे को &lt;br /&gt;महज अदायगी रस्में नही निभाते &lt;br /&gt;मेरी चिट्ठियों की तरह &lt;br /&gt;--------------------------------&lt;br /&gt;मुकेश कुमार तिवारी&lt;br /&gt;दिनांक : १७-जुलाई-२००८ / सुबह : ०८:०० / मुंबई प्रवास के दौरान - हॉटेल एयरपोर्ट इन (विले-पार्ले)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-6797040309899080733?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html</link><author>mukuti@gmail.com (मुकेश कुमार तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>7</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-2692916667775621706</guid><pubDate>Fri, 11 Sep 2009 09:41:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-03T10:25:47.169+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>khamoshi</category><title>एक पत्र अपने पिताजी के नाम...</title><description>&lt;p&gt;आदरणीय पा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सादर प्रणाम। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी २५ सालों की जिंदगी में पहली बार कुछ कहना चाहता हूँ आपसे पा। कुछ ऐसी बातें जो हमेशा मुझे परेशान करती है। जिसे कहने की हिम्मत मैं आज तक नही जुटा पाया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;शम्भू चाचा से कई बार आप दोनों भाइयों की तकलीफों की कहानियाँ कई बार सुन चुका हूँ। आप उस वक्त सिर्फ़ १५ साल के थे और आपने अपनी १०वि की परीक्षा ही दी थी उस वक्त और आपके पिताजी मतलब दादा ने आपका साथ छोड़ दिया। ५ बहनों और ३ भाइयो में आप सबसे छोटे थे। पांचो बुआ और सबसे बड़े वाले चाचा की शादी हो चुकी थी। वो अपने परिवार के साथ असम में रहते थे। दादा की मृत्यु के बाद आप, शम्भू चाचा और दादी बिल्कुल बेसहारा और अकेले हो गए थे। दादी की भी तबियत ज्यादा खराब रहने लगी और तब आप लोगों ने फ़ैसला किया आप अपना पैत्रिक गाँव छोड़ कर बड़े चाचा के पास चले जाओगे। आपने सोंचा था बड़े चाचा दादी का इलाज करवाएंगे पर हुआ कुछ अलग। उन्होंने आप लोगों को ज्यादा दिन अपने घर में रुकने नही दिया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;वहाँ से मायूस लौटने के बाद आप लोग पूर्णिया चले आए। दो बुआ की शादी पूर्णिया में ही हुई थी और आप लोगों को शायद उनके सहारे का ख्याल आया होगा। दोनों बुआ ने काफी हद तक (जहाँ तक वो कर सकती थी) आप लोगों की मदद भी की। आप और शम्भू चाचा दादी के साथ एक झोपडे में रहने लगे। आर्थिक दिक्कतों के कारण दादी ज्यादा दिन नही जी सकीं और दादा के मृत्यु के लगभग एक साल के अन्दर ही उनके पास चली गई। आप लोगों के पास तो दादी की क्रिया कर्म के भी पैसे नही थे। सबसे छोटी वाली बुआ ने अपने कंगन गिरवी रखकर आप लोगों को ५०० रुपये दिए थे जिन्हें बाद में आपने छुड़वा कर उन्हें लौटा दिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;आप लोगों ने क्या क्या काम नही किए। कचहरी में आपने खाद-बीज तक बेचे और चाचा ने तो साइकिल-रिक्शा तक चलाया। धीरे धीरे अपनी म्हणत से आप कचहरी में पेशकारी का काम करने लगे। इसी बीच आपकी शादी माँ के साथ हो गई और दीदी का जन्म भी हो गया। आप पढने में तेज थे पर पैसों के अभाव में कभी आप पढ़ नही पाए। यहाँ तक की जब आपने बैंक का फॉर्म भरा तब भी आपके पास पढने को किताबें नही थी। दिन भर आप काम करते और रात को थोडी बहुत पढाई कर पाते। आपने ही एक बार बताया था कि आप एक किताब खरीद कर लाये थे और रात भर उसे पढ़ कर आपने दूकान वाले को वापस कर दिया ये कह कर कि आपको इस किताब की जरूरत नही। अपनी मेहनत से आपने पहली बार में ही बैंक का एक्साम पास कर लिया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;इधर चाचा ने भी फूफा जी की मदद से जनवितरण प्रणाली की दूकान कर ली। आप दोनों भाइयों ने अपनी मेहनत से किस्मत को हरा दिया। आज आप एक खुशहाल परिवार के स्वामी है। बड़े चाचा के साथ आप लोगों का सम्बन्ध बिल्कुल ख़त्म ही था। पर मुझे आश्चर्य तब हुआ जब बड़े चाचा अपनी रिटायर्मेंट के बाद यहीं पूर्णिया आ कर बस गए। और उससे भी आश्चर्य जनक घटना मेरे लिए ये थी कि आप लोगों ने उनके साथ रिश्ता वापस जोड़ लिया था। मैं समझ नही पा रहा था कि आपलोग ऐसा कैसे कर सकते है। कैसे ऐसे आदमी के साथ रिश्ता जोड़ा जा सकता है जिन्होंने कभी अपने भाइयों की ख़बर तक न ली। जिसने अपनी बीमार माँ को सहारा तक न दिया यहाँ तक कि बड़ा बेटा होने के बावजूद उनकी क्रिया-कर्म तक को नही आया। मैं मान सकता हूँ आपका दिल बहुत विशाल है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;पर पा मुझे इससे भी ज्यादा दुःख तब हुआ जब आपने शम्भू चाचा को अकेले छोड़ दिया। उन्होंने कभी शादी नही की, पता है क्यों? क्योंकि वो आप को खोना नही चाहते थे। उनके मन में था कि शायद बड़े वाले चाचा की तरह शादी के बाद कहीं उनकी पत्नी भी आपको न घर से बहार कर दे। उन्होंने हमेशा हम लोगों में अपने बच्चे का चेहरा देखा। और आपने उन्हें ही घर से बहार का रास्ता दिखा दिया। आप बैंक में काम करने लगे थे और धीरे धीरे आपका स्टेटस बढ़ रहा था। आप अपने परिवार में व्यस्त होते गए और अपने भाई को भूलते गए। अकेलेपन के कारण उन में शराब की आदत पड़ती गई और ग़लत लोगों का सांगत पड़ता गया। पर अगर आप चाहते पा तो आप उन्हें वापस सही रास्ते पर ला सकते थे। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;पर शायद नही आपको तो अपने बड़े भाई का साथ मिल गया था। मानता हूँ कुछ उनकी शराब की आदत और कुछ सरकार की पॉलिसी के कारण वो आज फ़िर से आर्थिक संकट से गुजर रहे है। पर मैंने उन्हें कभी आपके सामने हाथ फैलाते हुए नही देखा। आज वो बीमार है, अकेले है। उन्हें किसी के साथ की जरूरत है पर आप तो अपने पैसे वाले बड़े भाई के साथ व्यस्त है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;पा मैं आपको हमेशा अपना भगवान मानता हूँ पर यहाँ आप ग़लत हो। आपने अपनी जिदगी में बहुत दुःख देखे है। हमारे लिए आपने बहुत कुछ किया। आज अगर मैं ये बातें कह रहा हूँ तो ये भी आपकी ही मेहनत और संस्कार है। पर पा आपके दुःख में शम्भू चाचा भी तो हर वक्त आपके साथ थे। और आपने उसका साथ देना शुरू कर दिया जिसे शायद मैं दुनिया में सबसे ज्यादा नफरत करता हूँ। इस लिए नही कि उसने मेरे लिए कुछ ग़लत किया पर इस लिए कि उसने अपनी माँ और भाई का भी साथ नही दिया। और ऐसे हर लोगों से मैं नफरत करता हूँ पा। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;मैं शम्भू चाचा को इस तरह अकेला नही देख सकता। आप को तो पता भी नही चलता होगा वो कहाँ है और कैसे है। अब तो मुझे डर लगता है पा कहीं किसी दिन वो हमें छोड़ कर चले जाए और आपको पता भी न चले। पा मैं उन्हें इस तरह मरते हुए नही देख सकता और मैं उन्हें अब जिंदगी के इस मोड़ पर अकेला नही छोड़ना चाहता। मैं उनका साथ निभाना चाहता हूँ, जो बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपने नही निभाया। पर पा मैं आपके और माँ ख़िलाफ़ भी नही जा सकता। मैं आप लोगों का विरोध भी नही कर सकता। बस एक ही विनती करूँगा पा आपके भाई को आपकी जरूरत है अभी। उनका साथ निभाइए। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;बात अगर बुरी लगी हो तो माफ़ी चाहूँगा।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;आपका बेटा, अभिषेक &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-2692916667775621706?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/09/blog-post.html</link><author>ab8oct@gmail.com (अभिषेक प्रसाद 'अवि')</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>12</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-7314436213730321887</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2009 04:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-08-29T10:36:06.367+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>गरिमा तिवारी</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>पिताजी</category><title>पिताजी : आप तो आप हैं</title><description>आप पर ना मरूँ तो क्या करूँ&lt;br /&gt;आपके सिवाय किसके लिये जियूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप ना होते तो होती मैं कैसे&lt;br /&gt;आपके बिना मैं जी सकती कैसे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन ही नहीं दिया सिर्फ आपने&lt;br /&gt;भरी है एक एक साँस जीवन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म तो सभी माँ-बाप दे देते हैं&lt;br /&gt;जीने का अर्थ समझाया है आपने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ दूं ऐसी पाक मोहब्बत को&lt;br /&gt;इबादत खुदा की किसलिए करूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप पर ना मरूँ तो क्या करूँ&lt;br /&gt;आपके सिवाय किसके लिये जियूँ&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-7314436213730321887?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/08/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (गरिमा)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>12</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-4668231579950092012</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2009 03:47:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-08-29T09:23:57.023+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>संस्मरण</category><title>"पिता जी पीछे-पीछे और मैं आगे-आगे।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)</title><description>&lt;table cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%" border="1"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;th style="COLOR: white; BACKGROUND-COLOR: blue" rowspan="2"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://uchcharan.blogspot.com/2009/03/blog-post_5328.html"&gt;&lt;span style="color:#ffffff;"&gt;गुरूकुल महाविद्यालय&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#ffffff;"&gt;,&lt;/span&gt; ज्वालापुर (हरद्वार) से मैं भाग कर घर आ गया था। पिता जी को यह अच्छा नही लगा। अतः वे मुझे अगले दिन फिर ज्वालापुर गुरूकुल में लेकर चल दिये। सुबह 10 बजे मैं और पिता जी गुरूकुल पहुँच गये।&lt;br /&gt;संरक्षक जी ने पिता जी कहा- ‘‘इस बालक का पैर एक बार निकल गया है, यह फिर भाग जायेगा।’’ पिता जी ने संरक्षक जी से कहा- ‘‘ अब मैंने इसे समझा दिया है। यह अब नही भागेगा।’’&lt;br /&gt;मेरे मन में क्या चल रहा था। यह तो सिर्फ मैं ही जानता था। दो बातें उस समय मन में थीं कि यदि मना करूँगा तो पिता जी सबके सामने पीटेंगे। यदि पिता जी ने पीटा तो साथियों के सामने मेरा अपमान हो जायेगा। इसलिए मैं अपने मन की बात अपनी जुबान पर नही लाया और ऊपर से ऐसी मुद्रा बना ली, जैसे मैं यहाँ आकर बहुत खुश हूँ। थोड़ी देर पिता जी मेरे साथ ही रहे। भण्डार में दोपहर का भोजन करके वो वापिस लौट गये।&lt;br /&gt;शाम को 6 बजे की ट्रेन थी, लेकिन वो सीधी नजीबाबाद नही जाती थी। लक्सर बदली करनी पड़ती थी। वहाँ से रात को 10 बजे दूसरी ट्रेन मिलती थी।&lt;br /&gt;इधर मैं गुरूकुल में अपने साथियों से घुलने-मिलने का नाटक करने लगा। संरक्षक जी को भी पूरा विश्वास हो गया कि ये बालक अब गुरूकुल से नही भागेगा।&lt;br /&gt;शाम को जैसे ही साढ़े चार बजे कि मैं संरक्षक जी के पास गया और मैने उनसे कहा- ‘‘गुरू जी मैं कपड़े धोने ट्यूब-वैल पर जा रहा हूँ।’’&lt;br /&gt;उन्होंने आज्ञा दे दी। मैंने गन्दे कपड़ों में एक झोला भी छिपाया हुआ था। अब तो जैसे ही ट्यूब-वैल पर गया तो वहाँ इक्का दुक्का ही लड्के थे, जो स्नान में मग्न थे। मैं फिर रेल की लाइन-लाइन हो लिया। कपड़े झोले मे रख ही लिए थे।&lt;br /&gt;ज्वालापुर स्टेशन पर पहुँच कर देखा कि पिता जी एक बैंच पर बैठ कर रेलगाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे। मैं भी आस-पास ही छिप गया।&lt;br /&gt;जैसे ही रेल आयी-पिता जी डिब्बे में चढ़ गये। अब मैं भी उनके आगे वाले डिब्बे में रेल में सवार हो गया। लक्सर स्टेशन पर मैं जल्दी से उतर कर छिप गया और पिता जी पर नजर रखने लगा। कुद देर बाद वो स्टेशन की बैंच पर लेट गये और सो गये।&lt;br /&gt;अब मैं आराम से टिकट खिड़की पर गया और 30 नये पैसे का नजीबाबाद का टिकट ले लिया। रात को 10 बजे गाड़ी आयी। पिता जी तो लक्सर स्टेशन पर सो ही रहे थे। मैं रेल में बैठा और रात में साढ़े ग्यारह बजे नजीबाबाद आ गया। नजीबाबाद स्टेशन पर ही मैं भी प्लेटफार्म की एक बैंच पर सो गया। सुबह 6 बजे उठ कर मैं घर पहुँच गया।&lt;br /&gt;माता जी और नानी जी ने पूछा कि तेरे पिता जी कहाँ हैं? मैं क्या उत्तर देता।&lt;br /&gt;एक घण्टे बाद पिता जी जब घर आये तो नानी ने पूछा-‘‘रूपचन्द को गुरूकुल छोड़ आये।‘‘&lt;br /&gt;पिता जी ने कहा-‘‘हाँ, बड़ा खुश था, अब उसका गुरूकुल में मन लग गया है।’’&lt;br /&gt;तभी माता जी मेरा हाथ पकड़ कर कमरे से बाहर लायीं और कहा-‘‘ये कौन है?’’&lt;br /&gt;&lt;a href="http://uchcharan.blogspot.com/2009/03/blog-post_5328.html"&gt;&lt;span style="color:#ffffff;"&gt;यह मेरी गुरूकुल की अन्तिम यात्रा रही।&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-4668231579950092012?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/08/blog-post_28.html</link><author>roopchandrashastri@gmail.com (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-3684224925831654200.post-2627032680649434124</guid><pubDate>Thu, 27 Aug 2009 01:47:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-08-27T07:48:06.287+05:30</atom:updated><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>अविनाश वाचस्‍पति</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>ताऊ डॉट इन</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>वो कौन है</category><category domain='http://www.blogger.com/atom/ns#'>परिचयनामा</category><title>वो कौन है ?  (अविनाश वाचस्‍पति)</title><description>पिताजी &lt;br /&gt;पर रचना चाहिये ताजी&lt;br /&gt;हैं सब राजी&lt;br /&gt;फिर काहे भूल गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनके होने से हैं&lt;br /&gt;उन्‍हें ही भूल गए&lt;br /&gt;यह शिकायत नहीं&lt;br /&gt;इच्‍छा है मेरी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कौन बढ़ेगा&lt;br /&gt; आगे&lt;br /&gt;हसरत करेगा पूरी&lt;br /&gt;पिताजी &lt;br /&gt;के बारे में&lt;br /&gt;या अपने बारे में&lt;br /&gt;लिखेगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या आज &lt;a href="http://taau.taau.in"&gt;ताऊ डॉट इन&lt;/a&gt; पर&lt;br /&gt;तीन बजकर तैंतीस मिनिट पर&lt;br /&gt;आकर मिलें&lt;br /&gt;जो भी आएं&lt;br /&gt;अपनी उपस्थिति अवश्‍य&lt;br /&gt;दर्ज करायें&lt;br /&gt;और सच सच ही बतलायें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3684224925831654200-2627032680649434124?l=pitaajee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://pitaajee.blogspot.com/2009/08/blog-post_26.html</link><author>avinashvachaspati@gmail.com (अविनाश वाचस्पति)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item></channel></rss>